Tuesday, June 9, 2009

मैं अनपढ़

मैं अनपढ़ क्या कर सकता हूँ-
दीये की तरह जल सकता हूँ ,

रौशनी ओरों के लिए -
अंधेरो में रह सकता हूँ ,
मैं अनपढ़ क्या कर सकता हूँ |

लोगों के लिए ,मैं हँसी-
सपनो में जी सकता हूँ ,

मैं अनपढ़ क्या कर सकता हूँ-

ओरों के लिए मेरे कंधे-
अपनी अर्थी-
ख़ुद उठा सकता हूँ ,

मैं अनपढ़ क्या कर सकता हूँ-

1 comment:

Amit Harsh said...

.. बहुत सुंदर ...
पढने लिखने का सारा गुरूर जाता गया
एक अनपढ़ ऐसी बात समझा गया