Thursday, September 17, 2009

पहिये में ज़िन्दगी

सुबह उठते ही तीन पहिये वाला मुझे लेने आ जाता है | मैं रोज़ की तरह उसके साथ अपनी मंजिल की और चल देता हूँ | रस्ते में तीन पहिये को छोड़, चार, तीन, और फिर दो पहियों के सहारे अपनी मंजिल पर पंहुचा जाता हूँ | इन बदलते हुए पहियों में, मैं रोज़ एक नयी कहानी से गुज़रता हूँ | ऐसे में ज़िन्दगी के हर रंग, हर रूप को सामने से देखने का मोका मिला है |

रोज़ की तरह आज भी मैं, तीन पहिये से दिन की सुरुआत कर रहा था | पर आज न जाने गाड़ी में बैठते ही कुछ अजीब सा लगने लगा | शायद एक तरफ का पहिया लड़खडा रहा था | मैंने, इस तिपहिये को चला रहे वाहन चालक से पूछा, " भाई क्या बात है, आज तुम्हारी गाड़ी का मिजाज कुछ ठीक नहीं है?" तो वह झट से बोला, "क्या करे साहब किस्मत का मारा है | बेचारे को रोज़ अच्छी खुराक नहीं मिल पाती; इसलिए कमज़ोर हो गया है | " मैंने कहा, "ऐसी क्या बात हो गयी ?" वह बोला, " नहीं साहब कुछ खास नहीं! बेचारे को पोलियो हुआ है |" पोलियो हुआ है...... ! मैं उसके इस जवाब से भोंचक्का रहा गया| मैंने उसे कहा, " भला गाड़ी को भी पोलियो हो सकता है ? यह सुन वह बोला,"क्यूँ नहीं साहब जब हर साल एक बच्चे को पोलियो ड्राप पिलाने के बाद पोलियो हो सकता है तो फिर मेरी इस गाड़ी को पोलियो क्यों नहीं हो सकता?
उसकी इस दलील के बाद; मैं उसके अंदर चल रहे द्वन्द को समझ गया था | वह ज्यादा न उबले; इसलिए मैंने चुप्पी साध ली | अब आगे का सफर यूँ ही सन्नाटे में गुज़रने लगा | मैं उसे कुछ बोल पाता तब तक मेरा स्टैंड आ गया | अब मैं तिपहिये को छोड़, रबड़ के बड़े-बड़े पहियों में सवार हो गया | धक्का-मुक्की कर के, जैसे-तैसे गाड़ी में घुस तो गया, पर सरकारी गाड़ी में सफ़र करने का जो आनंद है, वह खड़े होकर ही महसूस किया जा सकता है | इस लिए मैं न चाहते हुए भी खड़े ही सफ़र करने लगा | अब आप सोचेंगे की आदमी बड़ा ही सनकी है | तो जनाब मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं की मैं पूरा सफ़र अपने पेरों के बल पर करूँ | सीट में बैठने की चाहत तो पूरी तब होती न, जब कोई सीट खाली होती | ऐसे में अपने मन को समझाना के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था |

जैसे-तैसे मैं सफ़र करने लगा कि अचानक मेरे कानों में आवाज़ आई, "भाई साहब मैं तो थक गया हूँ इन बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते | इन का भविष्य अंधेर है ही और इनके चक्कर में हमारा भविष्य भी अंधेर हो चला |"
ये सुन, थोडी देर के लिए मैं सोचने लगा, कि यह तो समझ आता है की बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है; परन्तु इसमें इन जनाब का भविष्य अंधेर कैसे हो गया | बात की गहराई तक पहुँचने के लिए मैंने अपने कानों को पूरी तरह एकाग्रता के साथ काम पर लगा दिया | फिर आवाज़ आई, " भाई साहब धीरज धरो अबकी बार तनख्वा न बड़ी तो हड़ताल और तेज कर दी जायेगी | और इससे भी कुछ न हुआ तो स्कूल बंद | ऐसे में सरकार को मानना ही पड़ेगा | " दूसरी तरफ से एक और आवाज़ आई, " अरे भाई ! स्कूल बंद कर के तो बच्चों की पढाई में असर पड़ेगा |" झट से एक और बोला, " तो इससे हमें क्या ? अगर पड़ता भी है तो पड़ने दो | वैसे भी इन बच्चों को पढ़ लिख कर कोई कलेक्टर थोड़े न बनना है | ऐसे में एक दो हफ्ता नहीं पढेंगे तो क्या हो जायेगा |

इन बातों को सुनकर मुझे कुछ नहीं हुआ | गलानी तो दूर की बात, आत्मा गलानी भी न हुई | होती भी कैसे, रोज़ जो इन बातों को सुनता हूँ | आदि हो चुका हूँ सफ़र के दौरान इन टेडी-मेडी बातों को सुनना | ऐसे में सोचता हूँ कि, इनके बोल देने से किसी का भविष्य थोड़े न बदल जायेगा, पर फिर भी कहीं न कहीं इन बच्चों को लेकर चिंता होती है | खेर ! इसी उधेड़बुन में मेरी मंजिल का एक और पडाव समाप्त हुआ |

अब आगे का रास्ता किस पहिये में गुजरेगा इसलिए मैं चोराहे पे जा खडा हुआ | एक पहिया, दो पहिया , तीन पहिया , चार पहिया किसी-किसी में तो पहिये की गिनती ही न थी | ढांचा भी सभी का अलग-अलग | किसी पहिये को जुगाड़ कहा जाता तो किसी पहिये को मोटर कार | पर मुझे मेरी मंजिल तक ले जाने वाला कोई भी पहिया न दिखा | फिर मैंने सोचा, जब तक कोई पहिया मुझे लेने आता है तब तक चाय पी लूं | पास की ठेली पर , मैं चाय पीने चला गया |

चाय की चुस्कियां लेते हुए मेरी नज़र, जूठे गिलासों को धो रहे एक बच्चे पर पड़ी | मैंने चाय वाले से पूछा, " भाई ये लड़का कौन है ?" वो बोला, " मेरा लड़का है साहब |" तो मैंने पूछा, "तुम इसे स्कूल नहीं भेजते | "
चाय वाला ," नहीं नहीं ये स्कूल जाता है | पर आज ये दूकान में मेरे साथ आ गया |" मैंने बच्चे से पूछा, "क्यूँ भाई आज स्कूल क्यों नहीं गए ?" मासूम सा बच्चा मेरी और देखने लगा | उसकी आँखों में बच्चपन की वो सारी बातें मोजूद थी जो एक सामान्य बच्चों में होती हैं | मेरे इस तरह सवाल पूछने पर वो थोडा घबरा रहा था |
मैंने बच्चे से एक बार और स्कूल न जाने का कारण पूछा; तो इस बार वह बोला ," स्कूल में दो दिन से खाना नहीं मिल रहा है न....|" और इतना बोल कर वो वहाँ से चला गया |

अब बच्चे की इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था | वैसे भी इस बारे में, मैं कुछ नहीं बोल सकता हूँ , और ना ही अपने विचार व्यक्त कर सकता हूँ | अब मेरी भलाई इस में ही थी की मैं वहाँ से चला जाऊं | और मैं चौराहे में अपने पहिये का इंतजार करूँ |
तभी सामने ने चार पाऊँ और दो पहियों वाला आ खडा हुआ | अदना सा कद कांठी वाला आदमी किसी राजा के सिपेसालार की तरह हाथो में डोरी पकडे हुए , मुझसे पूछने लगा, " कौन दिशा को जाना है साहब ?" मैंने कहा, "दिशा को नहीं 'तेलपुरा' जाना है |" वह बोला, " तेलपुरा ऊ तो बहुत दूर है | २०० रुपया लगेगा | अगर जाना है तो हम घुमा ले, अपने गाड़ी को उस दिशा में ? बोलो साहब क्या सोचता है ?"

अब इसकी बात तो मैं समझ गया | पर मेरी दुविधा ये थी कि मैं इस चार पाऊं और दो पहिये वाले गाड़ी को अपनी ट्रेवल सीट में क्या लिख कर दिखाऊं | क्योंकि अब तक तो मैं ऑटो बस और कार ही अपनी ट्रेवल सीट में लिखा करता हूँ | अब इसे क्या लिखूं , घोड़ा गाड़ी या बेल गाड़ी | वैसे इसे लिखने में मुझे कोई हर्ज नहीं है पर इसका तो कोई पर्चा भी न मिलेगा मुझे | लेकिन जाना भी जरुरी था, तो मैं बैठ गया |

खट-खट , घड-घड , उबड़-खबड़ करते हुए मैं आगे का सफ़र तै करने लगा | रस्ते में गाड़ी वाले ने मुझसे पूछा, "साहब आप तेलपुरा में सकुल को जा रहे है न ?" मैंने कहा तुम्हे कैसे पता कि मैं स्कूल को जा रहा हूँ |" वह बोला," आज कल तेलपुरा में जो भी आता है वह सकुल ही जाता है | वैसे साहब मैं भी तेलपुरा का ही रहने वाला हूँ |" अच्छा!

फिर तपाक से बोला ," मेरे दो बच्चे वहाँ पढ़ते हैं, उन्हें देखना |" मैंने अपना सिर हिलाया और हामी भर दी |
फिर थोडा और रुक कर बोला ,"खुब मेहनत करो साहब, कि हमारे बच्चे पढ़ लिख जाएँ |"

अब मैंने उसके इस बात का कोई जवाब नहीं दिया, पर उसकी आँखों में अपने बच्चों के भविष्य को लेकर जो सपना था , उसे मैं साफ-साफ देख रहा था | रस्ते भर वह बडबडाता रहा | कभी अपनी आपबीती सुनाता, तो कभी बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हो जाता | उसकी इन बातों ही बातों में न जाने कब मेरी मंजिल आ गयी , मुझे पता ही नहीं चला | वह बोला, "साहब कहाँ खो गए | उतर जाओ आपका सकुल आ गया |"
उसके इतन कहते ही मैं अपनी सोच की निंद्रा से जाग उठा | और उसे फिर मिलेंगे कह कर स्कूल में चला गया |........