आजकल मेरे आस पास के वातावरण बहुत ही... बुझी बुझी सी लग रही है ! मैं सोच रहा हूँ कि ये क्या हो रहा है ! क्यों मेरी आत्मा इतनी अशांत है ! विश्व में चरों ओर मंदी की मार ने, तराही- तराही मचा रखा है ! लोग आत्मा हत्तिया तक कर रहे हैं ! चलो ये सब तो मंदी की मर का अशर है, पर क्या मंदी की इस विकराल रूप का पहाड़ आम लोगों के ही उपर पड़ना था ? क्या ये सही है? किसी संस्था या कम्पनी में से, निचे के उन श्रमिको की छटनी की जाए, जिनसे कभी आपका काम चल रहा था ? और क्या आज उनकी जरुरत नहीं ?
चलो इस बात को छोड़ भी दे , की फंड नहीं है ! कंपनी का मॉल नहीं बिक रहा, कंपनी घाटे में है ! तो उसके लिए आपकी ऐसी निति का निर्माण , जिसमे किसी गरीब का चूल्हा बंद हो जाए ? निति का ऐसा निर्माण क्यों नहीं होता जिसमे दो वक्त की रोटी तो मिलती रहे !
हमारे देश में कई ऐसी संस्थाए हैं ! जिनमें एक आम आदमी काम करता है ! उसकी मेहनत के बल पर संस्थाओ ने अपने काम किए हैं ! और आज उनको ही दो जून की रोटी के लिया भटकना पड़ रहा है ! इन्हें इस तरह से निकल दिया, जिसतरह कोई अपने सड़े हुए अंग को निकल बहार फेंकता है !
क्या ये सही है ?